
कार्यकाल (Tenure)
लॉर्ड वारेन हेस्टिंग्स ने भारत में कंपनी शासन को एक व्यापारी संस्था से प्रशासनिक साम्राज्य में बदलने की नींव रखी:
- बंगाल का गवर्नर (1772–1774): 1772 में कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स द्वारा नियुक्त।
- बंगाल का प्रथम गवर्नर-जनरल (1774–1785): 1773 के रेगुलेटिंग एक्ट के तहत नियुक्त।
प्रशासनिक एवं वित्तीय सुधार
- द्वैध शासन (Dual Government) की समाप्ति (1772): रॉबर्ट क्लाइव द्वारा 1765 में शुरू की गई दोहरी व्यवस्था समाप्त कर कंपनी ने दीवानी और निजामत के अधिकार सीधे अपने हाथ में लिए।
- राजकोष का स्थानांतरण: सरकारी खजाने (Treasury) को मुर्शिदाबाद से हटाकर कलकत्ता लाया गया, जिससे कलकत्ता बंगाल की वास्तविक प्रशासनिक राजधानी बनी।
- भू-राजस्व प्रयोग (इजारदारी प्रथा):
- पंचवर्षीय बंदोबस्त (1772): सबसे ऊंची बोली लगाने वाले को 5 वर्ष के लिए राजस्व वसूली का अधिकार (Auction System) दिया गया।
- एकवर्षीय बंदोबस्त (1777): पंचवर्षीय प्रणाली की विफलता के बाद वार्षिक नीलामी प्रणाली लागू की गई।
- राजस्व प्रशासन की निगरानी के लिए ‘बोर्ड ऑफ रेवेन्यू’ की स्थापना की गई।
- व्यापारिक सुधार: आंतरिक व्यापार में दस्तक (Free Pass) के दुरुपयोग को समाप्त किया गया और चुंगी चौकियों की संख्या घटाकर केवल 5 (कलकत्ता, हुगली, मुर्शिदाबाद, पटना और ढाका) तक सीमित की गई।
न्यायिक सुधार
- न्यायालयों की द्वि-स्तरीय व्यवस्था (1772):
- जिला स्तर: जिला दीवानी अदालत (कलेक्टर के अधीन) और जिला फौजदारी अदालत (काजी और मुफ्ती के अधीन)।
- अपीलीय अदालतें: सदर दीवानी अदालत और सदर निज़ामत अदालत (कलकत्ता में स्थानांतरित)।
- सुप्रीम कोर्ट की स्थापना (1774): 1773 के रेगुलेटिंग एक्ट के तहत कलकत्ता के फोर्ट विलियम में सुप्रीम कोर्ट की स्थापना हुई (प्रथम मुख्य न्यायाधीश: सर एलिजा इम्पे)।
- कानूनों का संकलन: हिंदू कानूनों का एक संकलन तैयार कराया गया, जिसका 1776 में N. B. Halhed ने ‘कोड ऑफ जेंटू लॉज’ (Code of Gentoo Laws) नाम से अंग्रेजी में अनुवाद किया।
विदेश नीति, सुरक्षा एवं युद्ध
| घटना / युद्ध | वर्ष | प्रमुख परिणाम / संधि |
| प्रथम रुहेला युद्ध | 1774 | अवध के नवाब शुजाउद्दौला की सहायता कर रुहेलखंड का विलय अवध में कराया। |
| प्रथम आंग्ल-मराठा युद्ध | 1775–82 | सालबाई की संधि (1782) द्वारा 20 वर्षों के लिए शांति स्थापित हुई। |
| द्वितीय आंग्ल-मैसूर युद्ध | 1780–84 | हैदर अली के खिलाफ पोर्टो नोवो की लड़ाई; मंगलोर की संधि (1784) द्वारा युद्ध समाप्त। |
| घेरे की नीति (Ring Fence Policy) | 1770s-80s | अपने राज्य की सुरक्षा के लिए पड़ोसी राज्यों (जैसे अवध) को बफर स्टेट (Buffer State) के रूप में इस्तेमाल करना। |
प्राच्यविद्या, शिक्षा एवं सांस्कृतिक योगदान
- कलकत्ता मदरसा (1781): मुस्लिम कानून और संबंधित विषयों के अध्ययन के लिए भारत में प्रथम ब्रिटिश शैक्षणिक संस्थान की स्थापना की।
- एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल (1784): सर विलियम जोन्स द्वारा स्थापना; हेस्टिंग्स ने इसे संरक्षण (Patronage) दिया।
- साहित्यिक अनुवाद: चार्ल्स विल्किंस द्वारा किए गए श्रीमद्भगवद्गीता के प्रथम अंग्रेजी अनुवाद की प्रस्तावना (Introduction) हेस्टिंग्स ने स्वयं लिखी।
प्रमुख विवाद एवं महाभियोग
- नंद कुमार का मामला (1775): हेस्टिंग्स पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाने वाले दीवान नंद कुमार को एलिजा इम्पे के जरिए जाली दस्तावेज के मामले में फांसी दिलाई गई, जिसे इतिहासकारों ने “न्यायिक हत्या” (Judicial Murder) कहा।
- बनारस के राजा चैत सिंह और अवध की बेगमों का शोषण: कंपनी की वित्तीय जरूरतों के लिए अवैध धन की वसूली।
- बनारस के राजा चैत सिंह का दमन (1781):
- अवैध मांग: संधि के तहत तय वार्षिक नजराने (₹22.5 लाख) के अतिरिक्त हेस्टिंग्स ने बार-बार ₹5 लाख का ‘युद्ध कर’ और 2,000 घुड़सवार सैनिक मांगे।
- कार्रवाई: विरोध करने पर हेस्टिंग्स ने ₹50 लाख का भारी जुर्माना ठोका और राजा को उनके महल में नजरबंद कर दिया।
- नतीजा: बनारस में विद्रोह भड़कने पर हेस्टिंग्स को जान बचाकर चुनार भागना पड़ा। बाद में सैन्य बल से विद्रोह कुचलकर चैत सिंह को गद्दी से हटा दिया गया और नया नजराना बढ़ाकर ₹40 लाख वार्षिक कर दिया गया।
- अवध की बेगमों की लूट (1781–1782):
- विश्वासघात: नवाब आसफउद्दौला पर बकाया सैन्य खर्च वसूलने के लिए हेस्टिंग्स ने कंपनी की ही पुरानी सुरक्षा गारंटी को रद्द कर दिया।
- अत्याचार: फैजाबाद में राजमाताओं (बहू बेगम व नवाब बेगम) के महलों की घेराबंदी की गई, खाना-पानी रोका गया और उनके विश्वासपात्र प्रबंधकों को यातनाएं देकर गुप्त खजाने का पता उगलवाया गया।
- नतीजा: बेगमों से लगभग ₹1 करोड़ से अधिक की नकदी और आभूषण जबरन लूटे गए।
- बनारस के राजा चैत सिंह का दमन (1781):
- महाभियोग (1788–1795): ब्रिटेन लौटने पर एडमंड बर्क और फॉक्स ने हेस्टिंग्स पर ब्रिटिश संसद में महाभियोग चलाया (हालांकि 1795 में उसे सभी आरोपों से बरी कर दिया गया)।
बिहार के संदर्भ में भूमिका एवं प्रभाव (BPSC विशेष)
- नायब दीवान पद का अंत (1772): द्वैध शासन समाप्त करते समय बिहार के नायब दीवान राजा शिताब राय को पद से हटाकर बंदी बनाया गया। बाद में जांच में निर्दोष साबित होने पर उनके पुत्र कल्याण सिंह को ‘राय रायन’ नियुक्त किया गया।
- पटना प्रांतीय राजस्व परिषद (Provincial Council of Revenue): 1770 में गठित परिषद को 1773 में पुनर्गठित कर पटना को बंगाल प्रेसीडेंसी की 6 प्रांतीय परिषदों में से एक प्रमुख प्रशासनिक केंद्र बनाया गया।
- शोरा और अफीम पर कंपनी का एकाधिकार: बिहार के शोरा (Saltpetre – बारूद निर्माण) और अफीम (Opium) व्यापार पर कंपनी का सख्त प्रशासनिक व वित्तीय नियंत्रण स्थापित किया।
- चैत सिंह विद्रोह (1781) और बिहार के जमींदार: बनारस के राजा चैत सिंह के विद्रोह के दौरान हेस्टिंग्स जब चुनार में फंसा, तब बिहार के कई जमींदारों (हथुआ, टिकारी, भोजपुर और नरहट-सामोय के जमींदार) ने हेस्टिंग्स और ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ विद्रोह का समर्थन किया था, जिसे ब्रिटिश सेना ने दबाया।
- पटना गोलघर निर्माण की पृष्ठभूमि: 1770 के भीषण अकाल के बाद भविष्य के सूखे/अकाल से निपटने के लिए अनाज भंडारण हेतु कैप्टन जॉन गार्स्टिन द्वारा गोलघर के निर्माण का प्रस्ताव हेस्टिंग्स के कार्यकाल (1784) में ही स्वीकृत हुआ था (निर्माण 1786 में पूरा हुआ)।